Showing posts with label #आजादी. Show all posts
Showing posts with label #आजादी. Show all posts

Friday, August 8, 2014

बिटिया के नाम एक पत्र



प्रिय बिटिया-शुभाश्रीवाद
मैं आज बेहद खुश हूँ कि तुम सालों कि मेहनत और लगन से अपनी पढाई पूरी करने के बाद, एक प्रतिष्ठित संस्थान में नौकरी करने जा रही हो- मेरी तमाम शुभाकांक्षायें तुम्हारे साथ हैं.
आशा और उम्मीद है कि इमानदारी से अपनी जिम्मेवारियां निभाओगी. न्याय और समता की लड़ाई के लिए निकली हो, तो यह कभी मत भूलना कि संघर्ष ही तुम्हारे जीवन को एक सार्थक अर्थ भी देगा. न्याय का मतलब ही है सामाजिक,आर्थिक और राजनितिक न्याय. इन्साफ की कोई भी लड़ाई, लम्बी या अंतहीन नहीं होती.

महान भारतीय धर्म ग्रन्थ, सभ्यता,संस्कृति और परम्परा, हमेशा सिर्फ स्त्रियों को ही शील, संयम, मर्यादा, नैतिकता, आदर्श और देह शुचिता के पाठ पढ़ाती रही है. संस्कारों की सीलन अभी भी मौजूद है, इसलिए बदलते समय और समाज में तुम्हे (महिलाओं को) इससे मुक्त हो कर ही अपनी भूमिका निभानी होगी. स्त्री मुक्ति का सपना, सच में हर स्तर पर, बराबरी और इन्साफ का ही सपना है.

जानता हूँ कि तुम गूंगी गुड़िया नहीं बल्कि शिक्षित, जागृत और चेतना संम्पन हो, इसलिए किसी दबाव या तनाव में कभी कोई निर्णय ना लोगी. अपनी प्रतिभा और विवेक से ही, अपने जीवन के सभी महत्वपूर्ण फैसले करोगी. खुद फैसले लेने का अधिकार है तुम्हे- फैसला अंतत गलत या सही हो सकता है.

अस्मिता के सवाल पर कोई भी शर्त नाकाबिले बर्दास्त, क्योंकि कोई भी समझोता सम्मानजनक नहीं होता और मैं कभी भी तुम्हारी (दुनिया की किसी भी स्त्री की) आँखों में आंसू या चेहरे पर उदासी देख नहीं सकता-देखना नहीं चाहता.

हाँ! अगर कभी, कहीं, किसी ऐसी अपरिहार्य परिस्थिति में घिर ही जाओ, जहाँ जिन्दगी और मौत के बीच चुनाव करना पड़े, तो घबराना नहीं और आत्म सुरक्षा के लिए आखिरी दम तक लड़ना- हार-जीत की परवाह किये बिना. घर,परिवार,समाज या लोकलाज के डर से  छुपाने या चुप्प रहने की आवश्यकता नहीं. हर हाल में अन्याय का विरोध-प्रतिरोध आवश्यक है. दरअसल खामोशी अक्सर बेइंसाफी, शोषण, उत्पीड़न या अत्याचार को बढ़ावा देती है.

शोषण या उत्पीड़न के हर दुसाहसी हाथ-पाँव को तोड़ने की क्षमता तुममे भी है. अपरिहार्य स्थिति में जरूरत पड़े तो गला ही घोंट देना, ऐसी किसी भी कोशिश का. जो होगा देखा जायेगा. अपमानजनक जीवन से, सम्मान-जनक मौत बेहतर होती है. मेरा मानना है कि बलात्कार की शिकायत के साथ कोर्ट-कचहरी करने से बेहतर है, हत्या के मुकदमें कि पैरवी कर लेना. और फिर आत्मरक्षा में किया कोई काम, अपराध तो है नहीं. अधिक कहने-सुनने की जरूरत नहीं-तुम स्वयं समझदार हो.
वहां पहुँच कर फोन करना/ करते रहना.
शुभाश्रीवाद और सस्नेह
तुम्हारा पापा

Wednesday, April 13, 2011

सेक्स की आजादी नैतिकता और कानून

राष्ट्रीय सहारा आधी दुनिया १३.४.२०११
वर्तमान में लड़कियां शादी नहीं कर रही, इसमें कुछ भी अजीब जैसा नहीं है। शिक्षित महिलाएं अब प्रशासक, पुलिस अधिकारी, विश्वविद्यालयीन शिक्षक, डॉक्टर, कानूनविद्, इंजीनियर, वैज्ञानिक जैसे पदों को सुशोभित कर रही हैं। दहेज दानव, नौकरी और दूसरी व्यक्तिगत इच्छाओं के कारण युवा और होनहार लड़कियां शादी नहीं करना चाहती और रिलेशनशिप में बंधती हैं। साथ ही, बिना शादी के सेक्स करती और बच्चा गोद लेती हैं। भारतीय समाज के चेहरे को देखें तो नैतिक मूल्यों, नैतिकता और सामाजिक रीति-रिवाजों में तेजी से बदलाव आ रहा है। कानूनी और न्यायिक समझ भी धीरे-धीरे स्थान और समय से काफी आगे देख रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने अविवाहित लड़कियों को मातृत्व लाभ से सम्मानित किया, लेकिन रखैल को गुजारा-भत्ता देने से इनकार कर दिया। औरत को यह हक हो कि वह मां बने-न बने। लेकिन पति की बिना सहमति के वह गर्भपात कराती है तो कोर्ट का कहना है कि यह पति के खिलाफ मानसिक क्रूरता है। बाल विवाह की मनाही है, अब भी यह कानूनसम्मत है। दिल्ली हाई कोर्ट ने नाबालिग से नाबालिग पति को हिरासत में लेने का आदेश दिया है। बाल विवाह और वैवाहिक बलात्कार के मामले में संवैधानिक वैधानिकता को लेकर दी गई याचिका पर विचार करने का मामला पिछले कई बरसों से अटका पड़ा है। विडंबनापूर्ण और परस्पर विरोधी फैसले कानूनी बिरादरी में गलतफहमी पैदा करते हैं। अक्सर कोर्ट कहता है- 'यह कोर्ट का अधिकार नहीं है कि वह कानून बनाए या उसे लागू करे। कानून की व्याख्या की आड़ लेकर कोर्ट कानूनी भाषा में तब्दीली नहीं कर सकती।'
विवाह-पूर्व सेक्स अपराध नहीं
सर्वोच्च अदालत ने विवाह-पूर्व सेक्स मसले पर यह फैसला सुनाया- 'यह सच है कि भारतीय समाज की आमराय है कि वैवाहिक पार्टनर के बीच यौन संबंध होने चाहिए। यदि आईपीसी की धारा-497 द्वारा परिभाषित 'व्यभिचार' को अपवादस्वरूप कोई वयस्क आम सहमति से यौन संबंध बनाता है तो यहां कोई कानूनन अपराध नहीं है।' (एस. खुशबू बनाम कान्निम्मल और अन्य)
लिव-इन रिलेशनशिप
एक मामले में सुप्रीम कोर्ट आया, एक औरत ने दूसरी जाति के पुरुष से शादी की और उनके परस्पर सहवास को 'लिव-इन रिलेशनशिप' में वयस्कों के बीच के रिश्ते को अपराध नहीं माना (व्यभिचार के स्पष्ट अपवाद के साथ), हालांकि इसे अनैतिक माना जा सकता है। इस तरह एक वयस्क लड़की अपनी पसंद से शादी कर सकती है या फिर पसंद के साथ रह सकती है। (लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश सरकार और अन्य एआईआर 2006 एससी 2522)
दूसरे व्यक्ति की पत्नी के साथ सेक्स की मनाही
भारतीय समाज में, नैतिकता का तकाजा 'नो सेक्स विदआउट मैरिज' है। इसे अनैतिक माना जाता है, जबकि विवाह पूर्व सेक्स अपराध नहीं है। व्यभिचार से जुड़े आपराधिक कानून (धारा-497 आईपीसी) सिर्फ विवाहित महिलाओं के वास्ते हैं और पुरुष (विवाहित भी) किसी भी अविवाहित, विधवा और तलाकशुदा के साथ रिश्ते बना सकता है। बिना अपने पति की सहमति या मिलीभगत के, दूसरे की पत्नी के साथ संबंध न बनाने को लेकर कानून है। लेकिन, यदि पति भी सहमत हो तो यह अपराध नहीं है। (सौमित्र विष्णु बनाम भारत सरकार)
बिना सेक्स-रिश्तों की शादी अभिशाप
दिल्ली हाई कोर्ट ने साफ कहा- 'इन दिनों यह सुझाव देना समझ से परे है कि पत्नी की यौन रिश्ते में सक्रिय भागीदारी न होने, इस तरह पति की यौनिक कमजोरी से पत्नी यौन सुख से वंचित हो रही है, इसका कोई खास मतलब नहीं है और इसलिए इसे क्रूरता के दायरे में नहीं लाया जा सकता।' बिना सेक्स वाली शादी एक अभिशाप है। शादी का केंद्र-बिंदु सेक्स है और बिना सशक्त एवं तालमेल के यौन रिश्ते के शादी को लंबे समय तक टिकाये रखना मुमकिन नहीं है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि शादी के बाद यौन-क्रिया औरत के पक्ष में, साथ ही प्रजनन के लिए जरूरी है। इसी का नतीजा है कि यदि औरत यौन रिश्तों में पूरी तरह संतुष्ट नहीं होती तो वह अवसाद और कुंठा की शिकार हो जाती है। यह भी कहा जाता है कि खुशहाल और सामंजस्यपूर्ण सेक्स रिश्ते औरत के दिमाग में जान डालते और चरित्र विकास के साथ उसके ऊर्जा को तिगुना बढ़ाते हैं। इसलिए स्वीकार किया जाना चाहिए कि सेक्सुअल रिश्ते में निराशा होगी, तो वैवाहिक जीवन को टिकाये रखना घातक हो जाएगा। (रीता निझावन बनाम बालाकिशन निझावन मामले में जस्टिस टी. टाटाचारी एवं
राजिंदर सच्चर, एआईआर 1973 दिल्ली। साथ ही देखें, 1980 का डॉ. श्रीकांत रंगाचारी अद्या बनाम श्रीमती अनुराध मामला) जस्टिस सच्चर ने यह फैसला इंग्लैंड की एक अदालत के आधार पर दिया, जिस पर भारतीय अदालतें व्यापक रूप से चल रही हैं। जानबूझकर इनकार और पति या पत्नी का सेक्स में अक्षमता 'क्रूरता' है और न्यायिक अलगाव या तलाक का आधार यह भी है कि 'असंतुष्टि' पति या पत्नी को अवसाद में झोंक सकती है लेकिन एक पार्टनर के तैयार होने के बावजूद दूसरे का जानबूझ कर सेक्स रिश्ते से इनकार दिमागी क्रूरता को जन्म देगा, वह भी तब जब वह जोड़ा नव विवाहित है और युवा है। दरअसल, खुशहाल और सामंजस्यपूर्ण सेक्स रिश्ते पत्नी के दिमाग को तरोताजा रखते हैं, खासकर चरित्र विकास में मदद करते हैं। इसलिए 'डेवलप हर कैरेक्टर' जैसे शब्द पर 'नो कमेंट्स' कहना उचित होगा।


युवा और नवविवाहित के लिए सेक्स
माननीय दिल्ली हाई कोर्ट कुछ वर्षो के बाद साफ करते हुए कहा, 'खुशहाल और सामंजस्यपूर्ण विवाह के लिए सामान्य और स्वस्थ यौन रिश्ते बुनियादी तत्व हैं। यदि किसी पार्टनर की बीमारी के चलते यह मुमकिन न हो पा रहा हो, तो मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे 'क्रूरता' की श्रेणी में रखा या नहीं रखा जा सकता है। लेकिन पार्टनर द्वारा सेक्स रिश्ते के लिए जानबूझकर इंकार करना, वह भी तब जब दूसरा इसके लिए चिंतित हो, तो यह दिमागी क्रूरता की जद में आएगा, खासकर तब जब दोनों पक्ष जवान और नवविवाहित हो।' (श्रीमती शकुंतला कुमार बनाम ओम प्रकाश घई, एआईआर 1981, दिल्ली-53) बाद के तथ्य, पक्के तौर पर ज्यादा तर्कसंगत और उद्देश्यपूर्ण ढंग से समझने वाली बातें हैं यानी खुशहाल और तालमेल भरे विवाह के लिए 'सामान्य और स्वस्थ यौन रिश्ते' बुनियादी घटक हैं लेकिन खराब सेहत के चलते पार्टनर यौन रिश्ते बनाने में सक्षम नहीं है तो यह 'क्रूरता' की श्रेणी में आ भी सकता है और नहीं भी आ सकता है। सिर्फ युवा और नवविवाहितों के मामले में दुराग्रहपूर्वक सेक्स रिश्ते बनाने से मना करने को दिमागी 'क्रूरता' के दायरे में रखा जाएगा। लेकिन खराब सेहत के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने मानने से इनकार कर दिया। (शेष पेज 2 पर)
सेक्स-इनकार से क्रूरता तक
पति या पत्नी द्वारा संभोग से इनकार करने, क्रूरता और अन्य संबंधित बातें पति से तलाक का आदेश प्राप्त करने का अधिकार प्रदान करते हैं। कानून की नजर में इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि दुराग्रह या नपुंसकता या दूसरी बीमारियों के कारण इनकार किया गया, क्योंकि इसका अंजाम कुंठा और सेक्सुअल लाइफ से जुड़े गम हैं। पति नपुंसक होगा, तो क्रूर होगा, तो उसके साथ रहने से इनकार का हक पत्नी को है। वह उससे गुजारा-भत्ता वसूलने की हकदार है।( धारा-125 सीआरपीसी-1973)

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के न्यायाधीश ने पुराने हिंदू विवाह कानून का सहारा लेकर फैसला सुनाया- 'जब दोनों पक्ष जवान हों और मानसिक विकार इस तरह का हो कि न तो वे से क्स रिश्ते बना पाते हैं और न ही बच्चा पैदा करने लायक हैं, तो यह शादी खत्म करने की ठोस बुनियाद हो सकती है क्योंकि हिंदू विवाह का मुख्य उद्देश्य परिणय-सूत्र में बंधकर बच्चे पैदा करना है, यहां विवाह-संस्कार में गर्भधारण करने और वंश बढ़ाने की सलाह दी जाती है।' (एआईआर 1991 एमपी 295)
पति नपुंसक, तो पत्नी दे गुजारा-भत्ता
पति के नपुंसक हो ने की सूरत में पत्नी उसे गुजारा-भत्ता दे। इसके लिए धारा 125 (3) सीआरपीसी, 1973 के अं तर्गत व्यवस्था है। न्यायाधीश एस. मुर्तजा फजल अली और ए. पी. सेन पति की याचिका को निरस्त करते हु ए कहा, 'विश्व महिला दिवस के मौके पर दुनिया के सभी बड़े देशों की कोशिश समाज में निष्पक्ष सेक्स को सही स्थान दे ने की है। जिस पुराने बंधन में वे बंधे हैं, उन्हें तोड़कर महिलाओं की पूर्ण मुक्ति के लिए वे काम कर रहे हैं । ऐसे में इस मसले को कबूल कर पाना काफी मुश्किल है कि कानू न के हितकारी प्रावधान खासकर पत्नी को महज रहने, खाने और कपड़े की जरूरत है औ र यदि वह पति की गुलाम है तो उसकी दया औ र चाहत पर निर्भर रहे, पत्नी की नजर से इस मसले को सं जीदगी से विचार करने की जरूरत है। यहां एक पत्नी है जो अपने पति संग रहने पर भी अविवाहिता जैसी जिंदगी गुजार रही या गुजारने के लिए विवश की जा रही है। ऐसी जिंदगी में निरं तर पीड़ा है जिससे उसका न सिर्फ मनोवैज्ञानिक हानि होता है बल्कि पत्नी की सेहत के लिए भी नुकसानदे ह है। निश्चित तौर पर, दीवानी और आपराधिक मुकदमों में दिमागी क्रूरता अलग नहीं होते , वैसी सूरत में जब अपराध की प्रवृत्तियां समान हों।' (माननीय न्यायाधीश एस. मुर्त जा फजल अली और ए. पी. सेन, सुप्रीम कोर्ट, सिराज मोहम्मद खान जान मोहम्मद खान बनाम हफीजु न्निसा यासीनखान, एआईआर 1981 सुप्रीम कोर्ट 1972) माननीय न्यायाधीश के. रामास्वामी और बी. एल. हंसारिया ने भी यही नजरिया रखकर कहा, 'औरत को अपने पति के घर रहना चाहिए, इस आशा और अपेक्षा के साथ कि वह वहां न सिर्फ खुश रहेगी बल्कि अपने पति के साथ शांतिपूर्ण दाम्पत्य समाज का निर्माण भी करेगी। जब वह पाती है कि उसका पति अपने से क्सु अल फर्ज को सही तरीके से नहीं निभा पा रहा है , जो उसके घर से जुड़े स्नेहपूर्ण रिश्तों में मजबूत बंधन की एक अहम कड़ी है। ऐसे में यह दाम्पत्य जीवन में चै न से रहने के नजरिये से पत्नी के लिए लगातार यंतण्रापूर्ण मामला है।'
सिविल लॉ में यंतण्रा तलाक और न्यायिक अलगाव का आधार है। ऐसी सूरत में, पति से अलग रहना न्यायसंगत है और वैवाहिक स्थिति को टिकाये रखना भी जरूरी है। (मेजर अशोक कुमार सिंह बनाम छठे एडिशनल जज, वाराणसी, 1 (1996) डीएमसी 115 एससी) पति की 'नपुंसकता' ही पत्नी को उसके सं ग न रहने देने का आधार है। ऐसे में, वह अपने पति से गुजारा-भत्ता पाने की हकदार है। लेकिन यदि वह दूसरी शादी कर लेती है, तो गुजारा-भत्ता नहीं पा सकेगी। व्यभिचारिणी या निर्ल ज्ज या यदि वह साध्वी नहीं है, तो भी उसे यह नहीं मिल सकेगा। शादी से पहले की पवित्रता और वैवाहिक-निष्ठा के मामले में पुरुष की तुलना में महिलाओं को लेकर कानून औ र नैतिक तकाजे इतने ज्यादा कठोर क्यों है?
पत्नी व्यभिचारिणी तो गुजारे-भत्ता की मनाही
संसद ने सीआरपीसी की धारा-125 (5) के तहत ऐसी 'पत्नी' को लेकर कड़ी शर्त रखी है- 'यदि इस धारा के तहत कोई सबूत के साथ पत्नी के पक्ष में फै सला आता है और वह व्यभिचारिणी है..तो न्यायाधीश ऐसे फैसले को निरस्त कर सकते हैं।'
हिन्दू गो द लेने एंड गुजारा-भत्ता कानून- 1956 की धारा-18 (3) के तहत भी यही कहा गयी- 'यदि वह पवित्र नहीं है या उसने हिंदू से धर्मान्तरण कर कोई औ र धर्म कबूल कर लिया हो तो हिंदू पत्नी अलग घर पाने और पति से गु जारे-भत्ते पाने की हकदार नहीं हो गी।'
हिंदू विवाह कानून-1955 की धारा-25 (3) में व्यवस्था है - 'यदि अदालत संतुष्ट है और उसने जिसके पक्ष में आदेश दिया गया है, वह पुनर्विवाह करता है, तो यदि वह पक्ष पत्नी है और व्यभिचारिणी नहीं है या यदि वह पक्ष पति है और विवाह से इतर वह किसी अन्य औरत के साथ संभोग करता है , 2) इसे दू सरे पक्ष के हिसाब से कह सकते हैं कि यदि अदालत के संज्ञान में आ जाए तो वह आदेश को अलग, संशोधित या निरस्त कर सकती है ।'
यह हिंदू कानून में अच्छी तरह कहा गया है कि 'यह नियम जनभावनाओं के अनुरूप है यानी यदि कोई विधवा व्यभिचारिणी है, तो उसे पति की संपति में कुछ नहीं मिले गा। पति के जीवित न होने की सूरत में उस विधवा को पति की न सिर्फ विरासत पाने के दौरान सच्चरित्र रहना चाहिए, बल्कि उसके बाद भी..।'
अब आजादी-प्राप्ति के बाद हिंदू उत्तराधिकार कानून, 1956 ने हिंदू कानून की खामियों को खत्म कर दिया, लेकिन दूसरे कानून अब भी औरत के विरोध में काम कर रहे हैं। अब सवाल है कि जहां पति के साथ रहने के बावजूद पत्नी ब्रह्मर्चय जीवन जीने को विवश की गयी है, जिसमें उसके साथ रहना यंतण्रापूर्ण है जो उसके लिए न सिर्फ दिमागी तौर पर नुकसानदेह है बल्कि उसकी सेहत के लिए भी जोखिम भरा है', ऐसे में उसे आगे आना और इंसाफ लेना चाहिए।