Wednesday, August 10, 2011

आनर किल्लिंग:शादी की आज़ादी



आनर किल्लिंग:शादी की आज़ादी
अरविन्द जैन
(राष्ट्रीय सहारा आधी दुनिया १०.८.२०११)

अगर न्याय के पहरेदारों और कानून के बीच टकराहट होती रहेगी, तो जाति और धर्म के सांकल में जकड़ी शादियां आजाद कैसे हो पाएंगी? अराजक निजी कानूनों और न्यायिक व्याख्याओं में बदलावों के बिना अंतर्जातीय/अंतर्धार्मिक शादियों से जुड़े सामाजिक-आर्थिक-राजनीति का गतिविज्ञान तेजी से नहीं बदलेगा।

सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायमूर्ति मार्कडेय काटजू और न्यायमूर्ति ज्ञान सुधा मिश्रा ने 19 अप्रैल, 2011 को सभी राज्यों सरकारों को निर्देश दिया कि वे ऑनर किलिंग्स को सख्ती से दबा दें। कोर्ट ने अधिकारियों को आगाह किया कि इस प्रथा को रोक पाने में नाकाम अधिकारियों को दंडित किया जाएगा। पिछले साल गृह मंत्री पी. चिदम्बरम ने भी भरोसा जताया था कि ऐसी हत्याओं को रोकने के लिए वह संसद में विधेयक पेश कर उसमें विशिष्ट तौर पर सख्त दंड की व्यवस्था करेंगे।

सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायमूर्ति मार्कडेय काटजू और न्यायमूर्ति अशोक भान ने 2006 में व्यवस्था दी कि ‘ किसी देश के लिए जाति व्यवस्था अभिशाप है और बेहतरी के लिए शीघ्रता से इसे खत्म करना होगा। वास्तव में, यह ऐसे समय में देश को बांट रहा है कि जब देश एकजुट होकर कई तरह की चुनौतियों का सामना कर रहा है। राष्ट्रीय हित में अंतर्जातीय शादियां हकीकत बन चुकी हैं, क्योंकि ये जाति व्यवस्था को नष्ट करने का नतीजा है। हालांकि, देश के विभिन्न हिस्सों से दुखदायी खबरें आती रहती हैं कि अंतर्जातीय शादियां करने के बाद युवा पुरुष और महिलाओं को धमकियां, यातनाएं या फिर हिंसक हो उठने जैसी घटनाएं हो रही हैं।’ मेरे विचार से, हिंसा, यातना और धमकी संबंधी ऐसा कृत्य पूरी तरह गैरकानूनी है और जो भी इसमें लिप्त हैं, उन्हें कड़ी सजा दी जानी चाहिए। भारत स्वतंत्र और लोकतांत्रिक देश है, और कोई लड़का या लड़की अपने पसंद से शादी कर सकता है। यदि उनके अभिभावक अंतर्जातीय या अंतर्धार्मिक शादी को मंजूरी नहीं देते, तो ज्यादा से ज्यादा यह मुमकिन है कि उनसे सामाजिक रिश्ता तोड़ लिया जाता है, लेकिन उनके खिलाफ हिंसा या उसे धमकाया नहीं किया जा सकता। इसीलिए, हम निर्देश देते हैं कि समूचे देश के प्रशासन/पुलिस को देखना होगा कि अंतर्धार्मिक या अंतर्जातीय शादियां किये हुए लड़के या लड़की के खिलाफ कोई यातना, धमकी, हिंसा या इसके लिए उकसाने जैसी कार्रवाई न होने पाये। अगर कोई ऐसा करता पाया जाए तो पुलिस ऐसे लोगों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई करे और कानून के तहत आगे कड़ी कार्रवाई संबंधी कदम उठाये। कभी- कभी, हम अंतर्धार्मिक या अंतर्जातीय शादियों को लेकर ऑनर किलिंग संबंधी घटनाओं के बारे सुनते हैं। ये शादियां अपनी मर्जी से की जाती हैं। ऐसे में, किसी तरह के मौत देने का कोई अच्छा मामला नहीं होता और वास्तव में, ऐसा कृत्य करने वाले बर्बर और शर्मनाक कृत्य कर बैठते हैं। यह बर्बर, सामंती मानसिकता के लोग हैं, जिन्हें कड़ा दंड दिये जाने की जरूरत है। सिर्फ ऐसा करके ही हम ऐसे बर्बरता संबंधी व्यवहार को खत्म कर सकते हैं। मां का नहीं पिता का नाम यह स्पष्ट नहीं है कि जाति व्यवस्था अभिशाप है, इसलिए जितनी जल्दी इसे खत्म कर दिया जाएगा, उतना ही बे हतर होगा क्योंकि इससे ऐसे समय में देश बंटता है, जब भारत को एक रखने के रास्ते में कई चुनौतियां हैं। इसलिए अंतर्जातीय शादियां राष्ट्रीय हित में हकीकत है। ऐसी शादियों के होते रहने से जाति व्यवस्था टूटेगी।

दूसरी ओर, सर्वोच्च अदालत ने कहा कि भारत में जाति व्यवस्था भारतीयों के दिमाग में रचा-बसा है। किसी कानूनी प्रावधान के न होने की सूरत में अंतर्जातीय शादियों होने पर कोई भी व्यक्ति अपने पिता की जाति का सहारा विरासत में लेता है, न कि मां का। (एआईआर सु. को. 2003, 5149 पैरा 27) सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति एच. के. सीमा और डॉ. ए आर लक्ष्मणन ने अर्जन कुमार मामले में स्पष्ट कहा कि ‘यह मामला आदिवासी महिला की एक गैर आदिवासी पति से शादी करने का है। पति कायस्थ है, इसलिए वह अनुसूचित जनजाति के होने का दावा नहीं कर सकता।’ (एआईआर सु. को. 2006, 1177) एक भारतीय बच्चे की जाति उसके पिता से विरासत में मिलती है, न कि मां से। अगर वह बिन ब्याही है और बच्चे के पिता का नाम नहीं जानती, तो वह क्या करे? महिला अपने पिता की जाति से होगी और शादी के बाद पति की जाति की। आपकी जाति और धर्म आपके पिता के धर्म/ जाति से जुड़ी होती है। कोई अपना धर्म बदल सकता है लेकिन जाति नहीं।

दुर्भाग्य से, भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में विशेष विवाह कानून, 1954 के तहत अंतर्जातीय विवाह को संचालित करने वाले बुनियादी कानून प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में इस कानून के तहत शादी के अंजाम संबंधी चौथे अध्याय में अंतर्जातीय विवाह को हतोत्साहित करते हैं। धारा-19 के मुताबिक, इस कानून के तहत शादी किसी अविभक्त हिंदू, बौद्ध, सिख या जैन अन्य धर्मावलंबी परिवार में आयोजित होती है, तो ऐसे परिवार से उन्हें अलग कर दिया जाएगा। कानून ऐसे हिंदू बौद्ध, सिख या जै न को आजादी देता है, जो अविभक्त परिवार के सदस्य हैं। ऐसे लोग अन्य धर्मो में शादी करते हैं तो शादी के दिन से उनके अपने परिवार के साथ रिश्ते अपने आप टूट जाएंगे। यह परोक्ष रूप से अवरोध निर्मित करता है और ऐलान करता है कि हम आपको गैर हिंदू पत्नी या पति को अपने परिवार में कबूल नहीं करेंगे। आप अपने विभक्त परिवार की संपत्ति में अपना हिस्सा, यदि कोई हो, लेते हैं तो परिवार से भी हाथ धोना पड़ेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात की भी ताकीद कर दी है कि अगर लड़के या लड़की के माता-पिता ऐसी अंतर्जातीय या अंतर्धार्मिक शादी को मंजूरी नहीं देते, तो वे अपने पुत्र या पुत्री से सामाजिक रिश्ते तोड़ सकते हैं। कोर्ट ने ठीक ही आगाह किया है कि ऐसी शादियां कर चुके लोगों को घर वाले किसी तरह की न तो धमकी दे सकते हैं और न ही मारपीट कर सकते हैं। वे इन्हें यातना भी नहीं दे सकते। जाति व्यवस्था वाले ऐसे पारंपरिक समाज में, शादी के लिए चुनाव काफी अहम हो जाता है। ऐसे में, अपनी जाति या धर्म से हटकर शादी के बारे में सोच पाना नामुमकिन है। हालांकि, भारत में शादी के तरीके में आया हाल का बदलाव अंतर्जातीय शादियों, खासकर आर्थिक रूप से मजबूत दज्रे के चलते बढ़त दर्शा रहा है। पंजाब, हरियाणा, असम और महाराष्ट्र में फिर भी अंतर्धार्मिक शादियों को अब भी प्रोत्साहन नहीं दिया जाता। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और राजस्थान जैसे राज्यों में पारंपरिक और सामंती माइंडसेट में बदलाव काफी कम देखा गया है इसलिए हमें निदरेष युवा लड़के और लड़कियों को ऑनर किलिंग से बचाने के लिए एकजुट होने की जरूरत है। ये वे युवा हैं, जो जाति और वर्ग रंिहत समाज में जीने की इच्छा रखते हैं।

अगर न्यायिक व्याख्याएं लिंग न्याय को स्वीकार नहीं करतीं, तो वक्त बीतने के साथ सामाजिक न्याय के बीज कैसे अंकुरित होंगे?
http://www.shabdankan.com/2013/09/honor-killing.html#.U_WF7aMR4Zl

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